19/07/2020
आज डयूटी जाने से पहले रास्ते में वारिश हो रही थी एक तेज रफ्तार आॅडी कार बाला तेज आवाज में ये रेशमी जुल्फे ये शरवती आॅखे गाना बजा रहा था। कुछ ही गाने होते है जिन्हे सुनने के लिये थोडी देर रूका जा सकता है ये गाना भी कुछ इसी तरह का है। मै ये देख नही पाया कि वो ड्राइवर था या खुद मालिक कार चला रहा था ये मेरा पसंदीदा गाना है और मुहम्मद रफी जी ने वडे प्यार से गया और सार्वकालिक मेरे प्रिय संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने संगीत मं ढाला है वारिश के मौसम में ऐसा गाना सुनना सुखद अहसास है ।
(ये सही है कि आॅडी वाला अभी-अभी रईस हुआ था क्योकि हाॅल ही मे रईस हुये लोग ही तेज आवाज में तेज रफ्तार में गाने सुनते है )खैर मुझे अपने गुरूजी द्वारा सुनाई गयी कहानी याद आ गयी वो वाकया भी मजेदार था क्लास के लडके ने लडकी को कुछ कह दिया था तो लडकी बोली  गुरूजी ये लडके जंगली  होते है काश ये जंगल  में  में पढ रहे होते तो कितना अच्छा होता गुरूजी वोले तुम्हे एक कहानी सुनाता हॅू एक गुरूकुल मे जन्म से ही लडको को प्रवेश  दिया जाता था उनके आश्रमें में स्त्रीयों का प्रवेश नही होता था सभी कार्यो का निस्पादन आदमी ही करते थे उनके सभी शिष्य बडे हो गये उन्होने अपने शिक्षा ग्रहणकाल में किसी स्त्री को नही देखा था गुरूजी ने सोचा कि शिष्यो को शहर दिखा दिया जाये वे सभी को लेकर शहर में गये वहाॅ मेला लगा था गुरूजी ने आवश्यकता की सभी चीजे खरीद ली उसके बाद वे चलने लगे एक शिष्य ने गुरूजी से पूछा कि हम सभीे के समान से दिखते वो तो पुरूष है लेकिन ये जो धीरे-धीरे चल रहे है कौन से प्राणी है गुरूजी ने मुस्कराकर  कर कह दिया ये हंस है बात आयी-गयी हो गयी। रात को गुरूजी ने शिष्यो से पूछा तुम्हे शहर कैसा लगा और क्या-क्या पंसंद आया सभी समवेत स्वर में चिल्ला पडे गुरूजी ‘हंस‘.........................................।





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