17/07/2020
आज व्टसएप गु्रप पर एक कहानी पढी एक वैद्य जी थे वे उतना ही दवाई का पैसा लेते जितने से उनके घर का दैनिक खर्च चल सके उनका कम्पाउंडर उन्हे इत्तला कर देता कि महाराज आज के खर्च का कोटा पूरा हो गया । उनकी पत्नी रोज अपनी आवश्यक सामान की सूची वैद्य जी को सुबह ही दे देती वैद्य जी रोज पर्ची देखते शाम को दैनिक खर्च के हिसाब से पैसे आ ही जाते वैद्य जी ने किसी से दवा के पैसे नही मांगे। वैद्य जी पत्नी की मांगी पर्ची को भगवान के सामने रख देते। एक दिन पत्नी ने जो पर्ची दी तो वैद्य जी को पसीने आ गये उसमे सूचना थी कि अपनी लाडली का विवाह है कैसे होगा वैद्य जी चिन्तातुर थे तभी एक उघोगपति आया और बोला वैद्य जी आपने मेरा लाइलाज रोग दूर किया था जिसपर मै लाखो रूपये खर्च कर चुका था आपकी लडकी का विवाह का सारा खर्च मै उठाउगा ।वैद्यजी बोले कैसी प्रभु की माया है आज ही पत्नी ने पर्ची में लिखा था की लडकी का विवाह है यह कह कर उन्होने उघोगपति को पर्ची दिखाई। यह उसकी आस्था की पराकाष्ठा थी कि भगवान ने उसकी समस्या सुन ली तथा समाधान दे दिया।
अब हम कहानी से निकल कर व्यवहारिकता की बात करते है।
1.क्या भगवान समस्या को सुनते और हल निकाल देते है।
2.क्या दवाई के नाम पर लूट खसूट कर वैघजी अपनी कन्या का विवाह नही कर सकते थे।
3. क्या हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिये जितना हमारी आवश्यकता हो।
4. ज्यादा कमाई के चक्कर में आयकर वैट आदि की चिन्ताये मुफ्त में लेकर अपनी आयु तो नही गवा रहे है क्योकि चीजे रिलीवेन्ट सन्दर्भित होती है एक चीज ज्यादा मात्रा में होने पर अपने साइड इफेक्ट भी साथ लाती है।
5.जिन्दगी में सन्तुलन आवश्यक है जिन्दगी नट की जैसी है जिस पर बामुश्किल से पतली डोरी पर चलना होता है ऐसे में पैसे कमाने की हौचपौच मे ंहम प्रकृतिक नही रह पाते अपने नेचर को ही पूर्णतहः बदल देते है क्या से क्या बन जाते है।
अगर आप इनमें से किसी भी बिन्दु पर सहमत हो तो कमेन्ट वाक्स मे जरूर 1/2/3/4/5 लिखे।
आज व्टसएप गु्रप पर एक कहानी पढी एक वैद्य जी थे वे उतना ही दवाई का पैसा लेते जितने से उनके घर का दैनिक खर्च चल सके उनका कम्पाउंडर उन्हे इत्तला कर देता कि महाराज आज के खर्च का कोटा पूरा हो गया । उनकी पत्नी रोज अपनी आवश्यक सामान की सूची वैद्य जी को सुबह ही दे देती वैद्य जी रोज पर्ची देखते शाम को दैनिक खर्च के हिसाब से पैसे आ ही जाते वैद्य जी ने किसी से दवा के पैसे नही मांगे। वैद्य जी पत्नी की मांगी पर्ची को भगवान के सामने रख देते। एक दिन पत्नी ने जो पर्ची दी तो वैद्य जी को पसीने आ गये उसमे सूचना थी कि अपनी लाडली का विवाह है कैसे होगा वैद्य जी चिन्तातुर थे तभी एक उघोगपति आया और बोला वैद्य जी आपने मेरा लाइलाज रोग दूर किया था जिसपर मै लाखो रूपये खर्च कर चुका था आपकी लडकी का विवाह का सारा खर्च मै उठाउगा ।वैद्यजी बोले कैसी प्रभु की माया है आज ही पत्नी ने पर्ची में लिखा था की लडकी का विवाह है यह कह कर उन्होने उघोगपति को पर्ची दिखाई। यह उसकी आस्था की पराकाष्ठा थी कि भगवान ने उसकी समस्या सुन ली तथा समाधान दे दिया।
अब हम कहानी से निकल कर व्यवहारिकता की बात करते है।
1.क्या भगवान समस्या को सुनते और हल निकाल देते है।
2.क्या दवाई के नाम पर लूट खसूट कर वैघजी अपनी कन्या का विवाह नही कर सकते थे।
3. क्या हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिये जितना हमारी आवश्यकता हो।
4. ज्यादा कमाई के चक्कर में आयकर वैट आदि की चिन्ताये मुफ्त में लेकर अपनी आयु तो नही गवा रहे है क्योकि चीजे रिलीवेन्ट सन्दर्भित होती है एक चीज ज्यादा मात्रा में होने पर अपने साइड इफेक्ट भी साथ लाती है।
5.जिन्दगी में सन्तुलन आवश्यक है जिन्दगी नट की जैसी है जिस पर बामुश्किल से पतली डोरी पर चलना होता है ऐसे में पैसे कमाने की हौचपौच मे ंहम प्रकृतिक नही रह पाते अपने नेचर को ही पूर्णतहः बदल देते है क्या से क्या बन जाते है।
अगर आप इनमें से किसी भी बिन्दु पर सहमत हो तो कमेन्ट वाक्स मे जरूर 1/2/3/4/5 लिखे।