11/07/2020
आज का दिन मेरे लिये कम और बेटी के लिये ज्यादा यादगार था उसका आज 10वी का परीक्षाफल था उसके 91.2 प्रतिशत अंक आये। उसका यह प्रयास इसलिये भी सरहनीय रहा कि उसने राज्य स्तर पर बास्केटवाॅल में चैम्पियिनशिप जीती तथा वाॅलीवाल में भी अपने वि़़द्यालय का प्रतिनिधित्व किया। अंग्लभाषा में ओपन भाषण प्रतियोगिता भी जीती। वह हर क्षेत्र में अच्छा कराना चाहती है ऐसे में उसके  प्राप्त अंको से मै संतुष्ट हॅू। और हाॅ यहाॅ यह भी कहना समीचीन होगा कि उसके प्राप्त अंक शायद अपने माता-पिता दौने के 10वी के अंको का योग होगा। हमारे जमाने में अंको का आभाव हुआ करता था जब रिजल्ट आता था तो अखबार का विशेष संसकरण प्रकाशित होता था । रात-रात भर इंतजार हुआ करना पडता था डिवीजन के हिसाब से अखबार वाला पैसे लेता था हाॅ फेल बाले से पैसे नही लिये जाते थे। जीवन में अंको का भी अलग महत्व है हाॅलकि कभी भी मैने परीक्षाफल में प्राप्त अंको को महत्व नही दिया ।  मै जानता हॅू कि एक यूनिवसिर्टी के बी0टेक के पास विद्याथियों के  साक्षात्कार में उन्हे मेज पर पडी मोटर को खोल कर बाॅध देने के लिये कहा गया एक भी प्रतिभागी प्रयास भी नही कर पाया। अतः बुक्शि नाॅलेज अगर जीवन का ज्ञान न दे सके तो बेकार है। मुझे अपने संस्कृत की किताब का वो पाठ वरबस याद आ जाता है जिसमे चार स्काॅलर किताबो की पोटली ले आश्रम से अंतिम परीक्षा पास कर जीवन के क्षेत्र में पादपर्ण करते है तो उन्हे एक नदी पार करनी होती है वो किताब खोल कर देखेेते है किताब का श्लोक  कहता है कि नदी का पत्ता आपको दिशा देगा कि किधर जाना है एक विद्याथी  उस पर कूद पडता है और कहता है चलो मेरे साथ पत्ते की तरफ जाना है उसे तैरना नही आता था अतः वो नदी मे डूबने लगा। दूसरे ने उसे डूबते देख किताब खोली उसमें लिखा था अगर  डूब रहे हो तो चोटी पकड लो उसने डूबते की चोटी पकड ली उसने आगे पूछा क्या करना है विद्याथी ने किताब निकाली और पढा लिखा था अगर घन डूब रहा हो तो जितना हो सके बचा लो उसने डूबते की चोटी काट दी और छोड दिया वो डूब गया इस प्रकार हम देखते है कि हमारी शिक्षा हमे वास्तविक जीवन के लिये तैयार नही करती। आज तक किसी किताब में नही लिखा कि अगर अचानक शेर आ जाये तो क्या करना  अलबत्ता चुटकुला जरूर महशूर है कि क्या करना है जो करना है वो तो शेर ने करना है पर यो कोई नही,इतिहास बताता है कि राजा स्कदंगुप्त शेर से लडता था और उसने शेर  पर विजय पायी थी शेरशाॅह सूरी ने शेर को मारा था । ये सब बाते मै इसकारण कह रहा हॅू क्योकि हमारे पाठ्क्रम में जीवन कौशल को कोई स्थान नही दिया गया है। एक आदिवासी लडकी  शहर के पढे-लिखे अध्यापक से अधिक जंगल की आत्मा को पहचानती है। वो जंगल महसूस कर सकती है उसमें तेजी से मोगली की तरह चपलता से निकल सकती है उसे पता है कि कब वरसाती नाला उफान पर होगा कब उसे झरने में नहाना और मस्ती करनी है कब नही करनी अर्थात प्रकृति का सम्मान करना है वो चिडियों से उन्ही की भाषा में बात कर सकती है। हो सकता है शहर के बच्चे अंग्रेजी में अच्छा बोल ले लेकिन जंगल में वो शायद सौ मीटर भी उस लडकी के बराबर भाग पाये।मै ऐसे बहुत से लोगो को जानता हॅू जिन्होने कोई औपचारिक शिक्षा नही प्राप्त की और वे अपने क्षेत्र के दिग्गज है।

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