26/8/2020
आज सुबह का अखबार पढ रहा था आगरा में  एक बच्ची की भूख से मौत हो गयी इस खबर ने मुझे अंदर तक हिला दिया। प्रशासन कह रहा है कि भूख से मौत तभी प्रमाणित होगी जबकि पोस्टमार्टम हो तथा रिर्पोट भूख से मरने की हो। यहाॅ यह भी कहना समीचीन होगा कि विभिन्न धर्मो में कहा गया है कि अगर तुम्हार पडोसी भूखा है तो आप चैन से कैसे भोजन कर सकते हो गढवाल में यह मिसल भी दी जाती है कि एक तिल को भी सात भाईयो ने मिल वांट कर खाया। आपको कोई भी सरदार भूखो नही मरते दिखा होगा यह कोैम बडी जीवट होती है और सामुदायिकता का बडा सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है गुरूद्वारे में कोई भूखा नही रह सकता और कभी आपदा आदि आयी हो तो ये बढ चढ कर मानवता की भलाई के कामो में लग जाते है ऐसा नही है कि और कौमो में ऐसा नही है । अगर भूख से कोई मर रहा हो तो यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वो भूखा न मरे जबकि देश में 2 साल का वफर स्टाॅक सुरक्षित है। मै यह तो नही जानता कि किसने मिड-डे मील योजना विद्यालयो में चलाई पर ऐसे उदहरण है कि बच्चे जिन्हे भोजन मिल रहा होता है वे कुछ भाग बचा कर घर ले जाते तथा उससे उनके माता-पिता का पेट भरता है। यह भी सराहनीय है कि एम्स के पास रोटी बैक लंगर खुला है तथ कई एन0जीओ0 होटलो का बचा हुआ भोजन गरीब और भूखो में बाॅट देते है। यहाॅ यह भी महत्वपूर्ण है कि तीन दिन लगातार भूखे रहने पर इतनी ताकत नही रहती कि पडोसी को आवाज भी दी जा सके। अगर कोई भूख से मरता है तो यह मानव संसाधन की क्षति है और देश का नुकसान है अगर यह कानून बन जाये कि भूख से मरने पर शासकीय मशीनरी को दंडित किया जा सके और वो भी बिना पोस्टमार्टम रिर्पोट , मुझे कोविड के दौरान देहरादून की घटना याद आ रही है जिसमे पक्के मकान में रहने बाले एक बुर्जग कोविड की सहायता का राशन लेने पहुच गये राशन वाले ने कहा आपका तो पक्का मकान है तो बुर्जग ने कहा कि सिर्फ मकान है खाने को कुछ नही है भारत मंे लगभग 33 करोड लोग एक वक्त का भोजन कर कर सोते है  ऐसा विधेयक बने कि कोइ्र भूखा न सो सके तभी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा फलीभूत होगी और यह कोई अव्यहारिक भी नही है कमी है तो सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति की। जीने के तीन मूलभूत सिद्वान्त रोटी कपडा और मकान में से हम पहला लक्ष्य तो हासिल कर ही सकते है।

Comments

Popular posts from this blog